बर्बरीक से खाटू श्याम तक का सफर
जन्म और पालन-पोषण
बर्बरीक का जन्म घटोत्कच (भीम के पुत्र) और मोरवी के घर हुआ। माता मोरवी नाग कन्या थीं। बर्बरीक ने देवी भगवती की कठोर तपस्या की और उनसे तीन अजेय बाण प्राप्त किए।
तीन बाण की शक्ति
इन तीन बाणों की शक्ति इतनी अपार थी कि पहले बाण से बर्बरीक उन सभी को चिह्नित कर सकते थे जिन्हें वे बचाना चाहते हैं। दूसरे बाण से उन सभी को चिह्नित करते जिन्हें नष्ट करना हो। और तीसरे बाण से दोनों काम एक साथ पूरे होते।
श्री कृष्ण से मुलाकात
जब बर्बरीक महाभारत युद्ध में शामिल होने जा रहे थे, तो उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वे कमजोर पक्ष की ओर से लड़ेंगे। श्री कृष्ण ब्राह्मण वेश में आए और बर्बरीक से उनकी शक्तियों के बारे में पूछा।
शीश दान का महावरदान
श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उनका शीश माँगा। बर्बरीक ने बिना एक पल हिचकिचाए अपना शीश काट कर दे दिया। श्री कृष्ण बर्बरीक की इस अद्भुत भक्ति और त्याग से बहुत प्रसन्न हुए।
कलियुग में नए नाम
श्री कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया कि कलियुग में वे "श्याम" नाम से जाने जाएंगे और हारे हुए, दुखी और पीड़ित लोगों के सहारा बनेंगे। उन्हें "लखदातार" — लाखों को देने वाले — कहा जाएगा।
खाटू में प्रकट होना
कलियुग में राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गाँव में एक गाय के थन से अपने आप दूध निकलता था। खुदाई करने पर बर्बरीक का शीश मिला। वहाँ भव्य मंदिर बनाया गया जो आज "खाटू श्याम मंदिर" के नाम से पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।
खाटू श्याम बाबा की इस पूरी कथा से हमें सीखने को मिलता है कि सच्ची भक्ति, त्याग और निःस्वार्थ सेवा से ही भगवान प्रसन्न होते हैं। आज करोड़ों भक्त बाबा के दर पर आते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ण करते हैं।